सर को ढक या कपड़ा रख करपूजा नहीं करना चाहिए

January 11, 2026

पूजनअनुष्ठानमांगलिक कार्य में सिर ढकने को शास्त्र निषेध।
आजकल एक कुप्रथा चल पड़ी है कि पूजन आरंभ होते ही रूमाल निकाल कर सर पर रख लेते हैं और कर्मकांड के लोग भी नहीं मना करते जबकि पूजा में सिर ढकने को शास्त्र निषेध करता हैशौच के समय ही सिर ढकने को कहा गया है प्रणाम करते समयजप व देव पूजा में सिर खुला रखें तभी शास्त्रोचित फल प्राप्त होगा
शास्त्र क्या कहते हैं
उष्णीषो कञ्चुकी चात्र मुक्तकेशीगलावृतः
प्रलपन् कम्पनश्चैव तत्कृतोनिष्फलो जपः॥
अर्थात्
पगड़ी पहनकरकुर्ता पहनकर नग्न होकर शिखा खोलकर कण्ठको वस्त्रसे लपेटकर बोलते हुए और काँपते हुए जो जप किया जाता है वह निष्फल होता है
शिर: प्रावृत्य कण्ठं वा मुक्तकच्छशिखोऽपि वा।
अकृत्वा पादयोः शौचमाचांतोऽप्यशुचिर्भवेत्
अर्थात्
सिर या कण्ठ को ढककर शिखा तथा कच्छलांगपिछोटा खुलने परबिना पैर धोये आचमन करने पर भी अशुद्ध रहता हैंअर्थात् पहले सिर व कण्ठ पर से वस्त्र हटायेशिखा व कच्छ बांधे फिर पाँवों को धोना चाहिएफिर आचमन करने के बाद व्यक्ति शुद्धदेवयजन योग्य होता है
सोपानस्को जलस्थो वा नोष्णीषीवाचमेद् बुधः
अर्थात्
बुध्दिमान् व्यक्ति को जूता पहनें हुएजल में स्थित होने परसिर पर पगड़ी इत्यादि धारणकर आचमन नहीं करना चाहिए
शिरः प्रावृत्य वस्त्रोण ध्यानं नैवप्रशस्यते कर्मठगुरूः
अर्थात्
वस्त्र से सिर ढककर भगवान का ध्यान नहीं करना चाहिए
उष्णीशी कञ्चुकी नग्नोमुक्तकेशो गणावृत।
अपवित्रकरोऽशुद्धः प्रलपन्न जपेत्क्वचित् ॥
शब्द कल्पद्रुम
अर्थात्सिर ढककरसिला वस्त्र धारण करबिना कच्छ केशिखा खुलीं होने पर
गले के वस्त्र लपेटकर
अपवित्र हाथों सेअपवित्र अवस्था में और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए
न जल्पंश्च न प्रावृतशिरास्तथायोगी याज्ञवल्क्य
अर्थात्न वार्ता करते हुए और न सिर ढककर
अपवित्रकरो नग्नः शिरसिप्रावृतोऽपि वा ।
प्रलपन् प्रजपेद्यावत्तावत् निष्फलमुच्यते ।। रामार्च्चनचन्द्रिकायाम्
अर्थात्अपवित्र हाथों सेबिना कच्छ केसिर ढककर जपादि कर्म जैसे किये जाते हैं वैसे ही निष्फल होते जाते हैं शिव महापुराण उमा खण्ड सिर पर पगड़ी रखकरकुर्ता पहनकर नंगा होकरबाल खोलकर गले के कपड़ा लपेटकर,अशुद्ध हाथ लेकरसम्पूर्ण शरीर से अशुद्ध रहकर और बोलते हुए कभी जप नहीं करना चाहिए

पंडित ओम प्रकाश शर्मा ज्योतिषाचार्य 

उज्जैन कार्तिक चौक भार्गव भाटी

9977742288

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